Publish Date: | Mon, 23 Aug 2021 07:22 PM (IST)
मोहखेड़। जीवन में अनेक ऐसी चीजें हैं, जो अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। जिसकी वजह कारीगरों के सामने आ रहा संकट है। अब कम ही कारीगर वैसे बचे हैं, जो उन चीजों को बनाते व बेचते थे। आधुनिक युग में अब वह चीजें नए स्वरूप में बिकने लगी हैं। कई चीजें गुम हो रही हैं। कुछ दिनों बाद वह किस्से कहानियों का हिस्सा बनकर रह जाएंगी। परंपरागत काम के सहारे जीवनयापन करने वालों को अब नए कार्य की तलाश करना विवशता बन गई है। क्षेत्र में परंपरागत व्यवस्था से जुड़े बढ़ई, लोहार, कुम्हार व मोची के सामने कामकाज का संकट है। शहर में रहने वाले लोगों ने व्यवसाय को नई दिशा इस देकर स्थिति से मुकाबला करने का साहस भी किया है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को महंगाई की मार व परंपरागत वस्तुओं की कम हो रही मांग ने जीना मुश्किल कर दिया है। वर्षों पूर्व लोग ग्रामीण मोची के हाथ का बना जूता चप्पल शौक से पहना करते थे, लेकिन अब विभिन्ना कंपनियों के आकर्षक जूता-चप्पल के निर्माण ने इनके मुंह से निवाला ही छीन लिया है। बढ़ई समुदाय ने परंपरागत कार्य को छोड़कर अब फर्नीचर निर्माण को जीवन यापन का सहारा बना लिया है। परंपरागत कृषि तंत्र के निर्माण में भी बड़ी कंपनियों ने अपना ठौर बना लिया है। अब हंसिया व खुरपी तक कंपनियां बनाने लगी है। ऐसे में लोहार समुदाय का पेशा छूटने लगा है। सरकार न कामगारों की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही है, जिससे दिन प्रतिदिन ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ती ही जा रही है।
विलुप्त होने के कगार पर है कुम्हारी उद्योग
कुम्हारों को मिट्टी उपलब्ध नहीं हो पा रही है। वहीं प्लास्टिक का प्रचलन बढ़ने से मिट्टी के बर्तनों की मांग कम हो गई है। इसके चलते कुम्हारों का व्यवसाय विलुप्त होने के कगार पर है। आज स्थिति यह है कि सदियों की धरोहर कुम्हारी कला विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। बुजुर्गों की मानें तो कभी छोटा बाजार हो या मेला, जगहों पर मिट्टी से बने बर्तनों और खिलौनों की भरमार रहती थी। गांव से लेकर शहरों तक हर कार्य प्रयोजन में मिट्टी के कुल्हड़ सहित अन्य बर्तन प्रयोग में लाए जाते थे, लेकिन अब मिट्टी के बर्तन पर आधुनिकता व मशीनरी युग का ग्रहण लग गया है। दीपावली में भी त्योहार को छोड़ दिया जाए तो इक्का दुक्का मिट्टी के बर्तन ही दिखाई देते हैं। कभी कुम्हारों के लिए मिट्टी का बर्तन आजीविका का साधन था, लेकिन मशीनी युग के चकाचौंध ने इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को बेरोजगार बना दिया है। प्लास्टिक का प्रचलन बढ़ने से मिट्टी के बर्तनों की मांग कम हो गई है। ऐसे में इस कारोबार से अब घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।
Posted By: Nai Dunia News Network
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खतरे में पारंपरिक व्यवसाय, जीवनयापन करना मुश्किल - Nai Dunia
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