दरभंगा। पहले कोराना अब महंगाई ने कुम्हारों का व्यवसाय चौपट कर दिया है। दीवाली का त्योहार नजदीक होने के बावजूद मौलागंज स्थित कुम्हार टोली में सन्नाटा पसरा हैं। उनकी दुकानों में भरपूर मात्रा में पारम्परिक दिये, कुल्हर, घैला , प्याली आदि उपलब्ध है। लेकिन ग्राहकों के इंतजार में उनलोगों की आंखें पथरा जा रही हैं। वर्षों पुराना उनका व्यवसाय इस कदर मार खा रहा है कि घर का खर्च चलाने के लिए कई लोगों को मेहनत-मजदूरी करनी पड़ रही है। दुकान से इतनी कमाई नहीं हो पाती है जिसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई का खर्च उठाने के अलावा अन्य जरूरतों को पूरा किया जा सके। मौलागंज के कुम्हार राजेन्द्र पंडित बताते हैं कि यहां 26 लोगों का परिवार बसता है। बाजार के अभाव में करीब-करीब हर घर से एक-दो लोगों को मेहनत मजदूरी पेट पालना पड़ रहा है। श्री पंडित बताते हैं कि वे खुद मजदूरी करने को मजबूर हैं। पेंट-पोचारा का काम कर वे परिवार को चलाने के लिए अतिरिक्त राशि जुटा पाते हैं। महंगाई की वजह से उनका व्यवसाय दम तोड़ने की कगार पर है। घी-तेल की कीमत आसमान छू रही है। इस वजह से दिए के खरीदार काफी कम हो गए हैं। चाइनीज झालर व प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां अब पारम्परिक दिए व मूर्तियों पर भारी पड़ने लगे हैं। दिए बनाने की सामग्री की कीमत भी आसमान छू रही है। बेचने के लिए पश्चिम बंगाल के चांडिल से थोड़े-बहुत दिए मंगा लेते हैं।योगन्द्र पंडित बताते हैं कि पूर्व में दीपावली से काफी दिनों पहले ही पूरे जिले से दुकानदार खरीदारी करने यहां पहुंचते थे। फिलहाल बाजार में पूरी तरह सन्नाटा पसरा है। आधुनिक दिए, चाइनीज झालर व प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों ने बाजार पर कब्जा जमा लिया है।
तेल व घी की कीमतों में जबरदस्त उछाल होने से लोग अब दीपावली में मोमबत्ती जलाकर काम चला लेते हैं। घर का खर्च पूरा करने के लिए पेंटिग का काम करना पड़ रहा है। तीन-साढ़े तीन सौ रूपये हो जाते हैं। तब जाकर घर का रोजाना खर्च चल पाता है। बाजार में सन्नाटा पसरा रहने के कारण उनकी पूंजी फंस गई है।
चकाचौंध के बीच फीका पड़ा कुम्हारों का पारम्परिक व्यवसाय - Hindustan हिंदी
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